- Hindi News
- राज्य
- पंजाब
- अमृतसर में जन्माष्टमी का अनोखा रंग, दही-हांडी नहीं बल्कि नंदोत्सव और बाल गोपाल की भक्ति है खास
अमृतसर में जन्माष्टमी का अनोखा रंग, दही-हांडी नहीं बल्कि नंदोत्सव और बाल गोपाल की भक्ति है खास
पुराने शहर के कटड़ों और बाजारों से लेकर दुर्गियाना मंदिर तक कृष्ण जन्माष्टमी की सदियों पुरानी परंपराएं आज भी कायम, राधा-कृष्ण की पोशाक और माखन-मिश्री भोग की बढ़ी मांग
अमृतसर में जन्माष्टमी का उत्सव दही-हांडी के बजाय नंदोत्सव, झांकियों, झूलों और बाल गोपाल की पूजा के लिए जाना जाता है। दुर्गियाना मंदिर समेत ऐतिहासिक मंदिरों में आधी रात को कृष्ण जन्मोत्सव मनाया जाता है।
देश के कई हिस्सों में जन्माष्टमी के दौरान दही-हांडी उत्सव आकर्षण का केंद्र रहता है, लेकिन अमृतसर में यह परंपरा प्रमुख नहीं है। पुराने शहर के ऐतिहासिक कटड़ों और बाजारों में कृष्ण भक्ति का स्वरूप पारंपरिक रूप से छोटे मोहल्ला मंदिरों और पारिवारिक देवस्थलों से जुड़ा रहा है। यहां जन्माष्टमी का मुख्य आकर्षण आधी रात होने वाला नंदोत्सव है, जिसमें भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा और पालना झुलाने की रस्म के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं।
दुर्गियाना मंदिर में आधी रात को नंदोत्सव
अमृतसर में जन्माष्टमी समारोह का सबसे प्रमुख केंद्र दुर्गियाना मंदिर है। आधी रात को बाल गोपाल के जन्म के अवसर पर पालना समारोह आयोजित किया जाता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस क्षण के साक्षी बनने के लिए मंदिर परिसर में इंतजार करते हैं।
इस दौरान राधा रानी और बाल कृष्ण के रूप में सजे बच्चे भी उत्सव की धार्मिक और सांस्कृतिक छटा बढ़ाते हैं। शहर के कई ऐतिहासिक मंदिरों में भी जन्माष्टमी पर विशेष पूजा और आधी रात के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।ऐतिहासिक मंदिरों में भी कृष्ण जन्मोत्सव की परंपरा
दुर्गियाना मंदिर प्रबंधन समिति के अधीन आने वाले कई ऐतिहासिक मंदिरों में जन्माष्टमी का आयोजन विशेष भक्ति के साथ किया जाता है।
राजा तेजा मंदिर की पुरानी परंपरा
चौकस्त्री अटारी क्षेत्र में स्थित राजा तेजा मंदिर राधा-कृष्ण को समर्पित ऐतिहासिक मंदिरों में शामिल है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार मंदिर उत्तर भारत में प्रचलित नागर स्थापत्य शैली का उदाहरण है।
समय के साथ मंदिर की भव्यता भले ही कम हुई हो, लेकिन यहां आधी रात को जन्माष्टमी मनाने की परंपरा अब भी जारी है।
करीब 200 साल पुराना राधा वल्लभ मंदिर
लोहगढ़ इलाके में स्थित राधा वल्लभ मंदिर भी अमृतसर की कृष्ण भक्ति की पुरानी विरासत का हिस्सा है। स्थानीय व्यापारी द्वारा बनवाए गए इस मंदिर में राधा और भगवान कृष्ण की मूर्तियां करीब 200 वर्ष पहले स्थापित किए जाने का उल्लेख मिलता है।
इन मंदिरों के अलावा दुर्गियाना मंदिर और इस्कॉन अमृतसर में भी जन्माष्टमी का आयोजन धार्मिक उत्साह के साथ किया जाता है।
ब्रज और वृंदावन की परंपराओं से जुड़ी कृष्ण भक्ति
पंजाब में कृष्ण पूजा पर ऐतिहासिक रूप से ब्रज और वृंदावन की भक्ति परंपराओं का प्रभाव रहा है। राधा-कृष्ण भक्ति, रसिक काव्य, झांकियां, झूले, कीर्तन और बाल कृष्ण की पूजा इसका हिस्सा हैं।
जन्माष्टमी पर कई परिवार अपने घरों को सजाते हैं और बाल गोपाल के लिए छोटा सा मंदिर या पूजा स्थल तैयार करते हैं। श्रद्धालु भगवान कृष्ण के मध्यरात्रि जन्म तक व्रत रखते हैं।
इन आयोजनों में फूलों से सजे पालने या झूले की खास भूमिका रहती है। इन्हें आभूषणों, आकर्षक कपड़ों और फूलों से सजाया जाता है।
राधा-कृष्ण की पोशाकों की बढ़ी मांग
जन्माष्टमी से करीब एक महीने पहले दुर्गियाना मंदिर के बाहर छोटी-छोटी दर्जी की दुकानों में राधा-कृष्ण की पोशाकें तैयार करने का काम तेज हो जाता है। खासकर मंदिर चौक से बड़े हनुमान मंदिर की ओर जाने वाली गली में दर्जी इन दिनों काफी व्यस्त नजर आते हैं।
पिछले 13 वर्षों से राधा-कृष्ण की पोशाक बनाने वाली सरोज रानी के मुताबिक पिछले दो सप्ताह से वह रोजाना 100 से अधिक जोड़ी पोशाकें तैयार कर रही हैं। उनके पास लगातार ऑर्डर आ रहे हैं और पोशाक की सजावट के स्तर के आधार पर कीमत तय की जाती है।
इन पोशाकों में कई डिजाइन पंजाबी संस्कृति की झलक भी दिखाते हैं। खास तौर पर फुलकारी के पारंपरिक मोटिफ वाली पोशाकें लोगों को आकर्षित करती हैं। जन्माष्टमी के आसपास इन पोशाकों की कीमत करीब 300 से 800 रुपये तक रहती है।
माखन-मिश्री और छप्पन भोग का विशेष महत्व
जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण को लगाए जाने वाले भोग में माखन-मिश्री सबसे पसंदीदा प्रसादों में शामिल है। ताजा मथा हुआ मक्खन और मिश्री से तैयार यह भोग कृष्ण के बाल स्वरूप से जुड़ी महत्वपूर्ण परंपरा माना जाता है।
अधिकांश श्रद्धालु घर पर माखन-मिश्री तैयार करते हैं। वहीं नोवेल्टी और हल्दीराम्स जैसी प्रमुख मिठाई की दुकानें भी हांडी में इसकी आकर्षक प्रस्तुति उपलब्ध कराती हैं।
कुछ श्रद्धालु जन्माष्टमी पर पारंपरिक छप्पन भोग भी तैयार करते हैं, जिसमें 56 अलग-अलग प्रकार के व्यंजन शामिल होते हैं। दुर्गियाना मंदिर में भी आधी रात पालना समारोह के बाद छप्पन भोग की रस्म आयोजित की जाती है।
Key Highlights:
- अमृतसर में दही-हांडी जन्माष्टमी की प्रमुख परंपरा नहीं है।
- दुर्गियाना मंदिर में आधी रात नंदोत्सव और पालना समारोह मुख्य आकर्षण रहता है।
- राजा तेजा मंदिर और राधा वल्लभ मंदिर जैसे ऐतिहासिक मंदिरों में भी जन्माष्टमी मनाई जाती है।
- ब्रज और वृंदावन की राधा-कृष्ण भक्ति परंपराओं का अमृतसर की कृष्ण पूजा पर प्रभाव है।
- जन्माष्टमी से पहले राधा-कृष्ण की पोशाकों की मांग बढ़ जाती है।
- फुलकारी मोटिफ वाली पोशाकों में पंजाबी संस्कृति की झलक दिखाई देती है।
- माखन-मिश्री और छप्पन भोग जन्माष्टमी के प्रमुख प्रसादों में शामिल हैं।
FAQ Section:
सवाल: अमृतसर में जन्माष्टमी का मुख्य आकर्षण क्या है?
जवाब: अमृतसर में जन्माष्टमी का प्रमुख आकर्षण आधी रात को होने वाला नंदोत्सव और बाल गोपाल का पालना समारोह है, खासकर दुर्गियाना मंदिर में।
सवाल: क्या अमृतसर में दही-हांडी का आयोजन प्रमुख रूप से होता है?
जवाब: देश के कई हिस्सों की तुलना में अमृतसर में दही-हांडी जन्माष्टमी की प्रमुख पारंपरिक गतिविधि नहीं है।
सवाल: अमृतसर के किन ऐतिहासिक मंदिरों में जन्माष्टमी मनाई जाती है?
जवाब: राजा तेजा मंदिर, राधा वल्लभ मंदिर और दुर्गियाना मंदिर सहित कई ऐतिहासिक मंदिरों में जन्माष्टमी के विशेष आयोजन होते हैं। इस्कॉन अमृतसर में भी उत्सव मनाया जाता है।
सवाल: जन्माष्टमी पर कौन सा भोग सबसे खास माना जाता है?
जवाब: माखन-मिश्री भगवान कृष्ण के सबसे लोकप्रिय भोगों में से एक है। इसके अलावा कई श्रद्धालु 56 प्रकार के व्यंजनों वाला छप्पन भोग भी तैयार करते हैं।
सवाल: राधा-कृष्ण की पोशाकों की कीमत कितनी होती है?
जवाब: जन्माष्टमी के दौरान अमृतसर में राधा-कृष्ण की पोशाकें आमतौर पर 300 से 800 रुपये के बीच मिलती हैं। कीमत सजावट और कढ़ाई के स्तर पर निर्भर करती है।
Conclusion:
अमृतसर में जन्माष्टमी का उत्सव देश के दूसरे हिस्सों से अलग अपनी विशिष्ट धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान रखता है। यहां दही-हांडी की जगह नंदोत्सव, बाल गोपाल का पालना, राधा-कृष्ण की सजी पोशाकें, झांकियां और माखन-मिश्री जैसे पारंपरिक आयोजनों की विशेष भूमिका है। ऐतिहासिक मंदिरों और परिवारों की पूजा परंपराएं आज भी शहर की कृष्ण भक्ति की पुरानी विरासत को आगे बढ़ा रही हैं।
