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चंडीगढ़ बैंक घोटाले में बड़ा खुलासा: HPGCL के फाइनेंस डायरेक्टर अमित दीवान पर ₹25–50 लाख कैश लेने के आरोप, CBI हिरासत में पूछताछ
डिलीवरी बॉय के जरिए IPL टिकट और नकद भुगतान का दावा, कोर्ट ने CBI को कस्टोडियल इंटेरोगेशन की अनुमति दी
CBI ने चंडीगढ़ के सबसे बड़े बैंक घोटालों में से एक में HPGCL के डायरेक्टर (फाइनेंस) अमित दीवान पर गंभीर आरोप लगाए हैं। जांच में सामने आया है कि उन्हें कथित तौर पर करोड़ों रुपये की नकद रकम और अन्य लाभ दिए गए। अदालत ने CBI को हिरासत में पूछताछ की मंजूरी दे दी है।
केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने खुलासा किया है कि हरियाणा पावर जेनरेशन कॉरपोरेशन लिमिटेड (HPGCL) के निदेशक (वित्त) अमित दीवान को कथित तौर पर दो से तीन बार प्रति माह ₹25 लाख से ₹50 लाख तक की नकद रकम दी जाती थी। यह भुगतान कथित रूप से चंडीगढ़ के इतिहास के दो सबसे बड़े बैंक घोटालों में से एक से जुड़ा है, जिसकी कुल राशि ₹200 करोड़ से अधिक बताई जा रही है।
जांच से जुड़े सूत्रों के अनुसार, CBI ने बताया कि मुख्य आरोपी और IDFC First Bank के पूर्व ब्रांच मैनेजर ऋभाव ऋषि के निर्देश पर उनका डिलीवरी बॉय अमृत पाल सिंह सबसे पहले अप्रैल 2025 में अमित दीवान को IPL टिकट देता था। इसके बाद मई 2025 से दो डिलीवरी बॉय के माध्यम से नियमित रूप से ₹25 लाख से ₹50 लाख तक नकद रकम पहुंचाई जाने लगी।
विशेष CBI अदालत की जज भावना जैन ने गुरुवार को अमित दीवान को 18 मई तक CBI पुलिस रिमांड पर भेज दिया, जबकि व्यवसायी विक्रम वाधवा को 16 मई तक CBI हिरासत में भेजा गया।CBI ने अदालत में कहा कि इस मामले में एक बड़े षड्यंत्र की जांच चल रही है और अभी कुछ ही लोगों की पहचान हो पाई है। एजेंसी के अनुसार, दीवान की हिरासत में पूछताछ आवश्यक है ताकि पूरे नेटवर्क और अन्य सहयोगियों का खुलासा किया जा सके।
CBI का कहना है कि दीवान के पास CREST खाते से HPGCL पेंशन फंड और ड्राई फ्लाई ऐश फंड में फंड ट्रांसफर, बैंक रिकॉर्ड में हेरफेर, फर्जी दस्तावेज तैयार करने और शेल कंपनियों के जरिए सरकारी धन की हेराफेरी से जुड़ी अहम जानकारी हो सकती है।
एजेंसी ने कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होता है कि दीवान की भूमिका प्रथम दृष्टया आपराधिक साजिश, विश्वासघात और अपराध की आय को प्राप्त करने से जुड़ी है।
दीवान की ओर से बचाव में कहा गया कि वे HPGCL में वित्त निदेशक होने के बावजूद बैंक ट्रांजैक्शन पर सीधे नियंत्रण नहीं रखते थे, क्योंकि अधिकृत साइनिंग अधिकार उनके अधीनस्थों के पास थे। साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि पहले की जांच में उनकी कोई भूमिका साबित नहीं हुई थी।
हालांकि अदालत ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि मौजूदा आरोप व्यक्तिगत स्तर पर भारी नकद भुगतान प्राप्त करने से जुड़े हैं, न कि केवल आधिकारिक कार्यों से। इसलिए धारा 17A की पूर्व अनुमति की आवश्यकता इस चरण पर लागू नहीं होती।
अदालत ने यह भी कहा कि रिमांड के दौरान मोबाइल फोन के उपयोग की अनुमति देने से जांच प्रभावित हो सकती है, इसलिए उनकी मांग खारिज कर दी गई।
मामले में व्यवसायी विक्रम वाधवा के बैंक खाते में लगभग ₹75 लाख की राशि सीधे CREST खाते से ट्रांसफर होने का भी खुलासा हुआ है।
अदालत ने कहा कि CBI की जांच में कोई दुर्भावना नहीं दिखाई देती, इसलिए एजेंसी को आगे की पूछताछ और पैसे के लेन-देन का पता लगाने के लिए हिरासत में पूछताछ की अनुमति दी जाती है।


