Haryana Human Rights Commission ने नूंह के सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति पर स्वतः संज्ञान लिया

बच्चों की पढ़ाई पशुशालाओं और खुले मैदानों में, आयोग ने बताया शिक्षा और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन

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हरियाणा मानवाधिकार आयोग ने नूंह जिले के सरकारी प्राथमिक विद्यालयों की बेहद खराब स्थिति पर स्वतः संज्ञान लेते हुए इसे बच्चों के शिक्षा, स्वास्थ्य और गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का गंभीर उल्लंघन बताया है।

Haryana Human Rights Commission (HHRC) ने हरियाणा के नूंह जिले में सरकारी प्राथमिक विद्यालयों की “चिंताजनक और अमानवीय” स्थिति पर स्वतः संज्ञान लेते हुए कार्यवाही शुरू की है। आयोग ने कहा कि मौजूदा हालात शिक्षा के अधिकार, स्वास्थ्य के अधिकार और गरिमापूर्ण जीवन जीने के मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन हैं।

पशुशालाओं और कीचड़ के बीच शिक्षा

आयोग की पूर्ण पीठ, जिसमें अध्यक्ष Justice Lalit Batra और सदस्य Kuldip Jain तथा Deep Bhatia शामिल थे, ने सरकारी उपेक्षा के कई गंभीर उदाहरणों को उजागर किया।

Kubda Bas गांव में बालवाटिका से कक्षा 3 तक के 62 बच्चों का प्राथमिक विद्यालय एक पशुशाला में संचालित हो रहा है। सरकारी भवन न होने के कारण यह जगह एक निजी जमीन मालिक द्वारा उपलब्ध कराई गई है।

स्कूल खत्म होने के बाद उसी स्थान पर गाय और भैंसें बांधी जाती हैं। रोजाना सफाई के बावजूद पशुओं के गोबर और गंदगी की बदबू बनी रहती है, जिससे बच्चों के लिए पढ़ाई का वातावरण बेहद अस्वस्थ हो गया है।

इसी तरह Kalu Bas गांव में 95 छात्र खुले मैदान में पढ़ाई करने को मजबूर हैं, जहां पेड़ों से ब्लैकबोर्ड बांधकर कक्षाएं लगाई जाती हैं।

आयोग ने कहा कि ये बच्चे बारिश के दौरान कीचड़, सर्दियों की ठंड और अन्य खराब मौसम की मार झेलते हैं, जिससे उनकी सुरक्षा और गरिमा दोनों प्रभावित हो रही हैं।

व्यवस्था की विफलता और घटती छात्र संख्या

गुरुग्राम जैसे हाई-टेक शहर के पड़ोसी जिले नूंह में कम-से-कम 19 स्कूल बिना किसी स्थायी भवन के चल रहे हैं। वर्ष 2020 में 68 नए स्कूलों को मंजूरी दी गई थी, लेकिन अब तक उनके लिए बुनियादी ढांचा तैयार नहीं हो सका है।

आयोग ने उठाए कई गंभीर मुद्दे

अव्यवहारिक भूमि आवंटन

कुछ मामलों में स्कूलों के लिए जो जमीन चिन्हित की गई है, वह गांव से 3.5 किलोमीटर से भी अधिक दूर स्थित है। आयोग ने कहा कि यह शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून का सीधा उल्लंघन है, जिसमें प्राथमिक विद्यालय गांव से अधिकतम 1 किलोमीटर दूरी के भीतर होना चाहिए।

शिक्षकों की भारी कमी

शिक्षकों की गंभीर कमी के कारण दूर-दराज जिलों से अनुबंध पर कर्मचारियों की नियुक्ति की गई। लंबी दूरी तय करने और सुविधाओं की कमी के चलते कई शिक्षकों ने नौकरी छोड़ दी, जिससे पढ़ाई और पाठ्यक्रम पर असर पड़ा।

छात्रों का पलायन

एक स्कूल में छात्रों की संख्या 525 से घटकर केवल 200 रह गई। बचे हुए बच्चों को अक्सर एक ही जर्जर और टपकती छत वाले कमरे में बैचों में पढ़ाया जाता है।

अंतरराष्ट्रीय नियमों का भी उल्लंघन

आयोग ने कहा कि बच्चों को जर्जर भवनों या पशुशालाओं में पढ़ने के लिए मजबूर करना संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार सम्मेलन (UN Convention on the Rights of the Child) के अनुच्छेद 28 और 29 का उल्लंघन है।

आयोग ने अपनी टिप्पणी में कहा,
“सुरक्षित, स्वच्छ और पर्याप्त शैक्षणिक बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराना केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि राज्य का मौलिक दायित्व है।”

आयोग ने मौजूदा स्थिति को “व्यवस्था की गंभीर विफलता” करार दिया।Screenshot_1141

Edited By: Karan Singh

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