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अरावली संरक्षण पर जनसुनवाई प्रक्रिया पर उठे सवाल, पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने ग्रामीणों की अनदेखी का लगाया आरोप
सुप्रीम कोर्ट की हाई पावर कमेटी की ऑनलाइन परामर्श प्रक्रिया पर आपत्ति, कार्यकर्ताओं ने गांवों में जाकर जनसुनवाई कराने की मांग की।
अरावली पर्वतमाला के संरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित हाई पावर कमेटी (HPC) की सार्वजनिक परामर्श प्रक्रिया पर पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि केवल ईमेल और गूगल फॉर्म आधारित व्यवस्था से ग्रामीण और आदिवासी समुदाय प्रभावी ढंग से अपनी बात नहीं रख पा रहे हैं।
अरावली संरक्षण को लेकर ऑनलाइन जनसुनवाई पर विवाद
अरावली पर्वतमाला के संरक्षण से जुड़े मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित हाई पावर कमेटी (HPC) की सार्वजनिक परामर्श प्रक्रिया को लेकर पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कड़ी आपत्ति जताई है।
कार्यकर्ताओं का कहना है कि समिति द्वारा आम लोगों से सुझाव लेने के लिए अपनाई गई ईमेल और गूगल फॉर्म आधारित प्रक्रिया ग्रामीण और आदिवासी समुदायों को प्रभावी भागीदारी से वंचित कर रही है।
ग्रामीण और आदिवासी समुदायों की भागीदारी पर चिंता

उनका मानना है कि यह प्रक्रिया शहरी और शिक्षित वर्ग के पक्ष में अधिक झुकी हुई दिखाई देती है।
पर्यावरणविद ने समिति से गांवों का दौरा करने की मांग की
रिज बचाओ आंदोलन के संयोजक और दिल्ली के पर्यावरण कार्यकर्ता दीवान सिंह ने कहा कि वर्तमान ऑनलाइन व्यवस्था संरचनात्मक रूप से ग्रामीण और आदिवासी समुदायों के साथ न्याय नहीं करती।
उन्होंने कहा कि अरावली क्षेत्र में रहने वाले लोग रोजाना पहाड़ियों, जंगलों, जल स्रोतों, कृषि भूमि और चारागाहों के नुकसान का सामना कर रहे हैं। इसके साथ ही उनकी पारंपरिक आजीविका, स्वास्थ्य और जीवनशैली भी प्रभावित हो रही है।
गांवों में जाकर वास्तविक स्थिति देखने की अपील
दीवान सिंह ने हाई पावर कमेटी से अपील की कि वह केवल ऑनलाइन सुझावों तक सीमित न रहे, बल्कि अरावली क्षेत्र के गांवों का दौरा कर स्थानीय लोगों से सीधे बातचीत करे।
उन्होंने आरोप लगाया कि हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में संचालित कई लाइसेंस प्राप्त खनन पट्टे नियमों का कथित रूप से उल्लंघन कर रहे हैं, जिससे पर्यावरण के साथ-साथ स्थानीय समुदायों के स्वास्थ्य और आजीविका पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है।
Key Highlights:
- अरावली संरक्षण पर HPC की ऑनलाइन परामर्श प्रक्रिया का विरोध।
- पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने ग्रामीण और आदिवासी समुदायों की अनदेखी का आरोप लगाया।
- ईमेल और गूगल फॉर्म आधारित व्यवस्था पर उठाए सवाल।
- 21 दिन की समय-सीमा को भी अपर्याप्त बताया गया।
- समिति से गांवों का दौरा कर जमीनी हकीकत जानने की मांग।
- हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में खनन गतिविधियों पर चिंता जताई गई।
FAQ Section
Q1. विवाद किस बात को लेकर है?
उत्तर: सुप्रीम कोर्ट की हाई पावर कमेटी द्वारा अरावली संरक्षण पर सुझाव लेने के लिए अपनाई गई ऑनलाइन प्रक्रिया को लेकर विवाद है।
Q2. पर्यावरण कार्यकर्ताओं की मुख्य आपत्ति क्या है?
उत्तर: उनका कहना है कि ईमेल और गूगल फॉर्म आधारित व्यवस्था ग्रामीण और आदिवासी समुदायों को प्रभावी भागीदारी से वंचित करती है।
Q3. कार्यकर्ताओं ने समिति से क्या मांग की है?
उत्तर: उन्होंने समिति से अरावली क्षेत्र के गांवों का दौरा कर स्थानीय लोगों से सीधे संवाद करने की मांग की है।
Q4. किन राज्यों का उल्लेख किया गया है?
उत्तर: हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में चल रही खनन गतिविधियों को लेकर चिंता जताई गई है।
Q5. पर्यावरणविदों के अनुसार स्थानीय लोगों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है?
उत्तर: उनके अनुसार पहाड़ियों, जंगलों, जल स्रोतों, कृषि भूमि और चारागाहों के नुकसान के साथ-साथ स्थानीय लोगों की आजीविका, स्वास्थ्य और पारंपरिक जीवनशैली प्रभावित हो रही है।
Conclusion:
अरावली संरक्षण से जुड़े मुद्दों पर सार्वजनिक भागीदारी सुनिश्चित करने को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि स्थानीय और आदिवासी समुदायों की आवाज को प्रभावी रूप से शामिल करना है, तो केवल डिजिटल प्रक्रिया पर्याप्त नहीं होगी और जमीनी स्तर पर संवाद को प्राथमिकता देनी होगी।
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