‘ग़ालिब इन द ग्लासहाउस’: ग़ालिब को नए नजरिए से पढ़ने की कोशिश

डॉ. गुरुपदेश सिंह की नई पुस्तक ‘दीवान-ए-ग़ालिब’ की 234 ग़ज़लों की गहन व्याख्या प्रस्तुत करती है

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डॉ. गुरुपदेश सिंह की नई पुस्तक ‘Ghalib in the Glasshouse’ मिर्ज़ा ग़ालिब की ‘दीवान-ए-ग़ालिब’ की 234 ग़ज़लों का विश्लेषणात्मक अध्ययन है। यह पुस्तक ग़ालिब की शायरी को जीवन प्रसंगों से आगे बढ़ाकर उनकी शैली, रूपकों, दर्शन और बौद्धिक गहराई के संदर्भ में समझने की कोशिश करती है।

मिर्ज़ा ग़ालिब को पढ़ना अपने आप में एक रोमांचकारी अनुभव है—भावनाओं का ऐसा संगम, जो पाठक को एक साथ कई स्तरों पर छूता है। उनके शेरों का अर्थ कभी एकरेखीय नहीं होता; वे पाठक को बार-बार नए अर्थ खोजने के लिए प्रेरित करते हैं।

इसी जटिलता और गहराई को समझने की कोशिश में लेखक, शिक्षाविद् और साहित्यिक आलोचक डॉ. गुरुपदेश सिंह अपनी नई पुस्तक ‘Ghalib in the Glasshouse’ लेकर आए हैं। यह पुस्तक ग़ालिब की प्रसिद्ध कृति ‘दीवान-ए-ग़ालिब’—जिसमें उनकी 234 उर्दू ग़ज़लें संकलित हैं—की एक विशिष्ट और गहन व्याख्या प्रस्तुत करती है।

प्रख्यात लेखक और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित अनीसुर रहमान, जो ‘The Essential Ghalib’ के लेखक हैं, इस पुस्तक को ग़ालिब पर “एक बिल्कुल अलग दृष्टिकोण” बताते हैं। वहीं आलोचक और अनुवादक आलोक भल्ला के अनुसार, यह पुस्तक ग़ालिब की लेखनी की भव्यता और उनके रोमानी तथा आध्यात्मिक संशय के बीच गहरा संबंध स्थापित करती है।

डॉ. गुरुपदेश सिंह के अनुसार,
“दीवान-ए-ग़ालिब उनकी काव्यात्मक आत्म-अभिव्यक्ति, व्यापक विश्वदृष्टि, निजी संघर्षों, विनोदप्रियता और बुद्धिमत्ता का संक्षिप्त लेकिन सघन दस्तावेज़ है। पाठक इसे पढ़ते हुए आकर्षित भी होते हैं और चुनौती भी महसूस करते हैं, भले ही उन्हें हर बार यह स्पष्ट न हो कि आखिर कौन-सी बात उनके मन या मस्तिष्क को छू जाती है।”

अक्सर ग़ालिब के प्रशंसक उनकी शायरी को उनके जीवन प्रसंगों से जोड़कर समझने की कोशिश करते हैं, लेकिन डॉ. गुरुपदेश उन्हें “एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व” के रूप में देखते हैं।
वे कहते हैं,
“ग़ालिब केवल एक रूमानी शायर नहीं हैं। वे सांसारिक और आध्यात्मिक ज्ञान, मानवीय साहस और कमजोरियों का एक पूरा संसार हैं। वे पाठक को बेचैन भी करते हैं, सम्मोहित भी करते हैं और अपनी बौद्धिक गहराई से रहस्यवाद की सीमाओं तक ले जाते हैं।”

डॉ. गुरुपदेश का यह साहित्यिक सफर नया नहीं है। इससे पहले वे समकालीन उर्दू कवि नासिर काज़मी की कविताओं की व्याख्या कर चुके हैं, जिनकी रचनाओं में विभाजन की पीड़ा, विस्थापन और longing की गहरी छाया दिखाई देती है।

गुरु नानक देव विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी विभाग के प्रोफेसर के रूप में सेवानिवृत्त होने के बाद डॉ. गुरुपदेश भाषाविज्ञान, अनुवाद और साहित्यिक शोध में सक्रिय रहे और अब लेखन के माध्यम से अपनी व्याख्यात्मक दृष्टि प्रस्तुत कर रहे हैं।

कविता के प्रति अपने जुनून को व्यक्त करते हुए वे कहते हैं कि ग़ालिब हर पीढ़ी के लिए नए अर्थ गढ़ते हैं।
“ग़ालिब शब्दों को रूपकों से इस तरह भर देते हैं कि हर शेर एक बौद्धिक अभ्यास बन जाता है। उन्हें अक्सर उनके जीवन और पत्रों के संदर्भ में पढ़ा गया है, लेकिन यह अध्ययन उनकी अलंकारिक शैली, विषय-वस्तु और हास्यबोध के माध्यम से ग़ज़लों को नए आयाम देता है।”

‘ग़ालिब इन द ग्लासहाउस’ इस मायने में एक महत्वपूर्ण पुस्तक है कि यह ग़ालिब को केवल इतिहास के पन्नों में सीमित शायर नहीं मानती, बल्कि उन्हें आज के पाठकों के लिए जीवंत और प्रासंगिक बनाती है।Screenshot_1094

Edited By: Karan Singh

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