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उर्दू और सूफी परंपरा पर जीएनडीयू में संगोष्ठी, आध्यात्मिक मूल्यों पर हुई चर्चा
उर्दू-फारसी विभाग ने सूफी विचारधारा और भारतीय संस्कृति में उसके योगदान को रेखांकित किया
गुरु नानक देव विश्वविद्यालय के उर्दू एवं फारसी विभाग द्वारा आयोजित एक दिवसीय संगोष्ठी में सूफी परंपराओं और उर्दू-फारसी साहित्य के आपसी संबंधों पर विचार-विमर्श किया गया। वक्ताओं ने भारतीय संस्कृति में सूफीवाद की भूमिका और धार्मिक सद्भाव में उसके योगदान को रेखांकित किया।
उर्दू और सूफी परंपरा का संबंध अत्यंत प्राचीन और गहरा है। मध्य एशिया से लेकर पंजाब तक रहस्यवाद और आध्यात्मिक मूल्यों के प्रसार में इन दोनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाबा फरीद, शाह हुसैन और सुल्तान बाहू जैसे संतों ने इस क्षेत्र में सूफी विचारधारा को व्यापक रूप से फैलाया।
इन्हीं परंपराओं और उर्दू-फारसी साहित्य के आपसी संबंधों पर प्रकाश डालने के लिए गुरु नानक देव विश्वविद्यालय (जीएनडीयू) के उर्दू एवं फारसी विभाग ने हाल ही में एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया। इसमें विभिन्न भाषाविदों और विद्वानों को आमंत्रित किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता इराक रज़ा जैदी, प्राध्यापक, उर्दू एवं फारसी विभाग, जीएनडीयू ने अपने संबोधन में कहा कि फारसी और उर्दू के विद्वानों के बीच रहस्यवाद और सूफीवाद को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण रहे हैं।
उन्होंने कहा, “निश्चित रूप से मेरा दृष्टिकोण दूसरों से अलग है।”
जैदी ने एक शेर का उल्लेख करते हुए कहा—
“यह अलग बात कि तामीर न होने पाए,
वरना हर ज़ेहन में एक ताजमहल होता है।”
उन्होंने कहा कि सूफीवाद और रहस्यवाद के तत्व हर व्यक्ति के भीतर मौजूद होते हैं। अंतर केवल इतना है कि किसी में यह झुकाव कम होता है और किसी में अधिक।
उन्होंने आगे कहा, “‘सूफी’ की परिभाषा तय करना उद्देश्य नहीं होना चाहिए। जो व्यक्ति आध्यात्मिकता, आत्म-शुद्धि, आंतरिक सुधार, मानवता के प्रति सहिष्णुता, समाज निर्माण की भावना, ईश्वर-प्रेम और संसार की बुराइयों से स्वयं को दूर रखने की क्षमता रखता है, वही सच्चा सूफी कहलाने योग्य है।”
संगोष्ठी की अध्यक्षता साहित्य अकादमी, चंडीगढ़ के अध्यक्ष मनमोहन सिंह ने की। उन्होंने कहा कि सूफीवाद का भारतीय परंपरा पर गहरा प्रभाव रहा है।
उद्घाटन भाषण में विभागाध्यक्ष मंजींदर सिंह ने कहा कि पंजाब की भूमि सूफी परंपरा से समृद्ध रही है और पंजाबी सूफियों ने सूफी विचारधारा के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
उन्होंने कहा, “भारतीय संस्कृति में सूफीवाद के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता, विशेषकर धार्मिक सद्भाव, सहिष्णुता और भाईचारे को बढ़ावा देने में सूफियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।”
संगोष्ठी में उपस्थित विद्वानों ने उर्दू और फारसी साहित्य के माध्यम से सूफी परंपरा की प्रासंगिकता पर गहन चर्चा की और इसे आज के समय में भी समान रूप से महत्वपूर्ण बताया।
