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पंजाब के बठ्ठ भाइयों की जैविक खेती की मिसाल, 2008 से बिना रसायन उगा रहे फसलें; नाशपाती से शहद तक तैयार कर रहे उत्पाद
मेहलांवाला गांव के रंजोध सिंह बठ्ठ और रंजीत सिंह बठ्ठ ने खेती को बनाया जीवनशैली, उपभोक्ताओं में जागरूकता की कमी और मजदूरों की समस्या को बताया बड़ी चुनौती
पंजाब के मेहलांवाला गांव के दो भाई करीब दो दशक से जैविक और प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। रंजोध और रंजीत सिंह बठ्ठ ने पारंपरिक फसलों से आगे बढ़कर नाशपाती का बाग, हल्दी की खेती और शहद उत्पादन भी शुरू किया है।
पंजाब के मेहलांवाला गांव के रहने वाले भाई रंजोध सिंह बठ्ठ और रंजीत सिंह बठ्ठ के लिए जैविक खेती महज रासायनिक खेती का विकल्प नहीं, बल्कि करीब दो दशक से अपनाई जा रही जीवनशैली है। दोनों भाई वर्ष 2008 से प्राकृतिक और टिकाऊ खेती के तरीकों को अपनाकर खेती कर रहे हैं।
किसान परिवार से आने वाले दोनों भाइयों को खेती के प्रति प्रेरणा अपने पिता और कम्युनिस्ट नेता जगतार सिंह मेहलांवाला से मिली। रंजोध सिंह ने कंप्यूटर साइंस में BSc की है, जबकि रंजीत सिंह ने राजनीतिक विज्ञान में MA किया है। उच्च शिक्षा के बावजूद दोनों भाइयों ने खेती को अपना रास्ता चुना।
पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर अपनाए नए प्रयोग
समय के साथ बठ्ठ भाइयों ने अपनी खेती को केवल पारंपरिक फसलों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने करीब 4.5 एकड़ में नाशपाती का बाग विकसित किया है। इसके अलावा वे हल्दी की खेती और शहद का उत्पादन भी कर रहे हैं।उनके खेतों में तैयार होने वाली नाशपाती की मांग पंजाब से बाहर भी है। इसका एक बड़ा हिस्सा कोलकाता में बेचा जाता है। इस तरह दोनों भाइयों ने जैविक खेती को स्थानीय बाजार से आगे दूसरे राज्यों तक पहुंचाने का प्रयास किया है।
मिट्टी की सेहत और प्राकृतिक खेती पर जोर
रंजोध और रंजीत का मानना है कि प्राकृतिक और जैविक खेती में रासायनिक इनपुट से दूरी बनाए रखना केवल उत्पादन की तकनीक नहीं, बल्कि लंबे समय तक मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने का तरीका भी है।
करीब 18 वर्षों से इस पद्धति पर काम करते हुए उन्होंने अपने खेतों में अलग-अलग कृषि गतिविधियों को जोड़ा है। इससे उन्हें खेती के विविध स्रोत विकसित करने में भी मदद मिली है।
जैविक उत्पादों की पहचान सबसे बड़ी चुनौती
बठ्ठ भाइयों के अनुसार, वास्तविक जैविक किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या उत्पादन की नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं में जागरूकता की कमी की है।
उनका कहना है कि बहुत से ग्राहक यह नहीं जानते कि वास्तविक जैविक उत्पाद की पहचान क्या है। वहीं, कुछ विक्रेता पारंपरिक तरीके से उगाई गई फसलों को भी जैविक बताकर बेच देते हैं।
नकली दावों से वास्तविक किसानों को नुकसान
रंजोध सिंह ने कहा कि गलत तरीके से जैविक बताकर उत्पाद बेचने से उपभोक्ता तो भ्रमित होते ही हैं, साथ ही उन किसानों के प्रयास भी प्रभावित होते हैं जो वर्षों से प्राकृतिक खेती करते हुए मिट्टी की सेहत बनाए रखने और रासायनिक पदार्थों से बचने की कोशिश कर रहे हैं।
उनके मुताबिक, वास्तविक जैविक किसानों के लिए उपभोक्ताओं का भरोसा बेहद महत्वपूर्ण है। सही जानकारी और जागरूकता बढ़ने से प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को बेहतर बाजार मिल सकता है।
मजदूरों की कमी भी बड़ी चुनौती
जैविक और प्राकृतिक खेती के विस्तार में कृषि मजदूरों की कमी भी बड़ी बाधा बनी हुई है। भाइयों के मुताबिक, इस तरह की खेती में कई कामों के लिए अधिक मानवीय श्रम की जरूरत पड़ती है।
खासकर खेतों में खरपतवार प्रबंधन और बागों की देखभाल के दौरान मजदूरों की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है। ऐसे में मजदूरों की बढ़ती कमी और उनकी बढ़ती लागत जैविक खेती का दायरा बढ़ाने में चुनौती बन रही है।
किसानों को धीरे-धीरे बदलाव की सलाह
रंजोध सिंह ने जैविक खेती की ओर जाने वाले किसानों को बड़े पैमाने पर अचानक बदलाव करने से बचने की सलाह दी है।
उनका सुझाव है कि किसान शुरुआत में अपने परिवार की जरूरत के लिए सब्जियां और अन्य खाद्य पदार्थ प्राकृतिक तरीके से उगाना शुरू करें। धीरे-धीरे अनुभव हासिल करने के बाद जैविक खेती का क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है।
Key Highlights:
- मेहलांवाला गांव के रंजोध सिंह बठ्ठ और रंजीत सिंह बठ्ठ वर्ष 2008 से जैविक खेती कर रहे हैं।
- दोनों भाइयों को खेती की प्रेरणा अपने पिता जगतार सिंह मेहलांवाला से मिली।
- रंजोध सिंह ने BSc Computer Science और रंजीत सिंह ने MA Political Science किया है।
- दोनों भाइयों ने करीब 4.5 एकड़ में नाशपाती का बाग विकसित किया है।
- वे हल्दी की खेती और शहद का उत्पादन भी करते हैं।
- उनकी नाशपाती पंजाब के बाहर, खासकर कोलकाता में भी बेची जाती है।
- किसानों के अनुसार जैविक उत्पादों को लेकर उपभोक्ताओं में जागरूकता की कमी बड़ी चुनौती है।
- कृषि मजदूरों की कमी और बढ़ती लागत भी प्राकृतिक खेती के विस्तार में बाधा है।
- रंजोध सिंह ने किसानों को छोटे स्तर से जैविक खेती शुरू करने की सलाह दी है।
FAQ Section:
बठ्ठ भाई कब से जैविक खेती कर रहे हैं?
रंजोध सिंह बठ्ठ और रंजीत सिंह बठ्ठ वर्ष 2008 से जैविक और प्राकृतिक खेती कर रहे हैं।
बठ्ठ भाइयों का गांव कौन सा है?
दोनों भाई पंजाब के मेहलांवाला गांव के रहने वाले हैं।
बठ्ठ भाई कौन-कौन सी खेती करते हैं?
वे नाशपाती का बाग, हल्दी की खेती और शहद उत्पादन करते हैं। उनका नाशपाती उत्पादन पंजाब के बाहर भी बाजार तक पहुंचता है।
उनकी नाशपाती कहां बेची जाती है?
बठ्ठ भाइयों की नाशपाती पंजाब के बाहर भी बेची जाती है और इसकी बड़ी मात्रा कोलकाता में पहुंचती है।
जैविक खेती में सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
भाइयों के अनुसार, उपभोक्ताओं में वास्तविक जैविक उत्पादों को लेकर जागरूकता की कमी और बाजार में गलत तरीके से जैविक बताए जाने वाले उत्पाद बड़ी चुनौतियां हैं। इसके अलावा मजदूरों की कमी और बढ़ती लागत भी समस्या है।
जैविक खेती शुरू करने वाले किसानों को क्या सलाह दी गई है?
रंजोध सिंह ने किसानों को बड़े पैमाने पर अचानक बदलाव करने के बजाय शुरुआत में अपने परिवार के लिए सब्जियां और अन्य खाद्य पदार्थ प्राकृतिक तरीके से उगाने की सलाह दी है।
Conclusion:
रंजोध सिंह बठ्ठ और रंजीत सिंह बठ्ठ की कहानी बताती है कि जैविक खेती केवल खेती की तकनीक नहीं, बल्कि लंबे समय तक अपनाई जाने वाली जीवनशैली भी हो सकती है। वर्ष 2008 से प्राकृतिक तरीकों पर टिके दोनों भाइयों ने नाशपाती, हल्दी और शहद जैसे विविध कृषि उत्पादों के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई है। हालांकि, उपभोक्ता जागरूकता, श्रमिकों की कमी और बढ़ती लागत जैसी चुनौतियां अब भी उनके सामने हैं।
