- Hindi News
- राज्य
- पंजाब
- Punjab to Europe: 40 साल से विदेश में पंजाबी भाषा-साहित्य की अलख जगा रहे नकोदर के मोता सिंह सराय
Punjab to Europe: 40 साल से विदेश में पंजाबी भाषा-साहित्य की अलख जगा रहे नकोदर के मोता सिंह सराय
1986 में इंग्लैंड पहुंचे मोता सिंह सराय ने प्रवासी पंजाबियों को भाषा और संस्कृति से जोड़े रखने का उठाया बीड़ा, 17 करोड़ रुपये से अधिक की पंजाबी किताबों के प्रकाशन व वितरण में निभाई भूमिका
नकोदर के रहने वाले मोता सिंह सराय करीब चार दशकों से इंग्लैंड में पंजाबी भाषा और साहित्य के संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने प्रवासी लेखकों को मंच देने के साथ 17 करोड़ रुपये से अधिक की पंजाबी पुस्तकों के प्रकाशन और वितरण में मदद की है।
पंजाब से हजारों लोग बेहतर भविष्य की तलाश में यूरोप पहुंचे, लेकिन नकोदर के रहने वाले मोता सिंह सराय ने विदेश जाकर अपनी मातृभाषा और साहित्य को साथ रखने का फैसला किया। करीब चार दशकों से वह यूरोप में बसे पंजाबी समुदाय के बीच भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने के प्रयास में जुटे हैं।
1986 में 24 वर्ष की उम्र में इंग्लैंड पहुंचे सराय ने समय के साथ महसूस किया कि विदेशों में जन्मी नई पीढ़ियों को पंजाबी भाषा और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना एक बड़ी चुनौती है। इसी सोच ने उनके साहित्यिक मिशन को दिशा दी।
1986 में इंग्लैंड पहुंचे, पंजाबी भाषा को बनाया मिशन
इंग्लैंड पहुंचने के बाद सराय का जुड़ाव पंजाबी साहित्य और प्रवासी समुदाय के बीच भाषा को जीवित रखने के प्रयासों से बढ़ता गया।उनका काम पंजाबी साहित्यिक संस्था ‘Punjabi Sath Lambra’ से भी जुड़ा रहा। इस संस्था की स्थापना 1991 में डॉ. निर्मल सिंह और प्यारा सिंह ने की थी।
बाद में यूरोप में संस्था की गतिविधियों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी सराय को सौंपी गई।
यूरोप में पंजाबी साहित्य को मिला नया मंच
इसके बाद European Punjabi Sath और Punjabi Sath Walsall के माध्यम से सराय ने पंजाबी साहित्य को प्रवासी समुदाय तक पहुंचाने के प्रयासों को व्यापक रूप दिया।
उन्होंने पंजाबी लेखकों को अपनी रचनाएं प्रकाशित कराने में मदद की, साहित्यिक कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया और ऐसे मंच तैयार किए जहां अलग-अलग देशों में रहने वाले लेखक और पाठक भाषा के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़ सकें।
17 करोड़ रुपये से ज्यादा की पंजाबी किताबों का प्रकाशन और वितरण
मोता सिंह सराय के साहित्यिक प्रयासों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पंजाबी पुस्तकों के प्रकाशन और वितरण से जुड़ा है।
पिछले वर्षों में उन्होंने 17 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की पंजाबी पुस्तकों के प्रकाशन और वितरण में सहयोग किया है। इससे पंजाब और विदेशों में रहने वाले पंजाबी पाठकों के बीच लेखकों की रचनाओं को पहुंचाने में मदद मिली।
यह प्रयास केवल किताबों को प्रकाशित करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रवासी समाज में पंजाबी साहित्य के लिए पाठक वर्ग तैयार करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण रहा।
‘भाषा हमें इतिहास और संस्कृति से जोड़ती है’
सराय के लिए पंजाबी भाषा का संरक्षण सिर्फ साहित्य को बचाए रखने का प्रयास नहीं है। वह इसे पंजाब की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देखते हैं।
उनके अनुसार भाषा व्यक्ति को उसके इतिहास, विरासत और संस्कृति से जोड़ती है और मातृभूमि के साथ संबंध बनाए रखने का माध्यम भी बनती है।
नई पीढ़ी को मातृभाषा से जोड़ना चुनौती
इंग्लैंड में रहने के दौरान सराय ने महसूस किया कि विदेशों में जन्मी और पली-बढ़ी नई पीढ़ी के लिए अपनी मातृभाषा से जुड़ाव बनाए रखना आसान नहीं है।
इसी वजह से उन्होंने पंजाबी भाषा को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने को अपने काम का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया।
उनका मानना है कि बच्चों और युवाओं को पंजाबी भाषा से जोड़ने से वे अपने इतिहास और मूल संस्कृति को बेहतर ढंग से समझ पाएंगे।
साहित्य के साथ सांस्कृतिक गतिविधियों को भी बढ़ावा
Punjabi Sath के माध्यम से साहित्यिक चर्चाओं और सांस्कृतिक गतिविधियों का आयोजन भी किया जाता रहा है। इन आयोजनों ने लेखकों, पाठकों और प्रवासी समुदाय के सदस्यों को एक साझा मंच उपलब्ध कराया है।
इस तरह साहित्य और भाषा के जरिए पंजाब से दूर रहने वाले लोगों के बीच सांस्कृतिक जुड़ाव मजबूत करने की कोशिश जारी है।
Key Highlights:
- नकोदर के रहने वाले मोता सिंह सराय 1986 से इंग्लैंड में रह रहे हैं।
- उन्होंने करीब चार दशकों से पंजाबी भाषा और साहित्य के संरक्षण के लिए काम किया है।
- सराय का जुड़ाव Punjabi Sath Lambra से रहा है।
- संस्था की स्थापना 1991 में डॉ. निर्मल सिंह और प्यारा सिंह ने की थी।
- बाद में यूरोप में इसकी गतिविधियों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी सराय को मिली।
- European Punjabi Sath और Punjabi Sath Walsall के जरिए उन्होंने साहित्यिक गतिविधियों को आगे बढ़ाया।
- उन्होंने पंजाबी लेखकों को किताबें प्रकाशित कराने और पाठकों तक पहुंचाने में मदद की।
- 17 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की पंजाबी पुस्तकों के प्रकाशन और वितरण में उन्होंने भूमिका निभाई।
- सराय भाषा को इतिहास, विरासत और संस्कृति से जोड़ने वाला माध्यम मानते हैं।
- उनका लक्ष्य विदेशों में जन्मी नई पीढ़ी को पंजाबी भाषा और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना है।
FAQ Section:
मोता सिंह सराय कौन हैं?
मोता सिंह सराय नकोदर के रहने वाले हैं और 1986 से इंग्लैंड में रहकर पंजाबी भाषा और साहित्य के संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं।
मोता सिंह सराय कब इंग्लैंड गए थे?
वह 1986 में 24 वर्ष की उम्र में इंग्लैंड चले गए थे।
Punjabi Sath Lambra की स्थापना कब हुई थी?
Punjabi Sath Lambra की स्थापना 1991 में डॉ. निर्मल सिंह और प्यारा सिंह ने की थी।
सराय ने पंजाबी साहित्य के लिए क्या काम किया है?
उन्होंने पंजाबी लेखकों को प्रकाशन के अवसर उपलब्ध कराने, साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित करने और प्रवासी पाठकों तक पंजाबी किताबें पहुंचाने में मदद की है।
उन्होंने कितनी पंजाबी पुस्तकों के प्रकाशन और वितरण में मदद की?
पिछले वर्षों में उन्होंने 17 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की पंजाबी पुस्तकों के प्रकाशन और वितरण में भूमिका निभाई है।
पंजाबी भाषा के संरक्षण को लेकर सराय की सोच क्या है?
उनका मानना है कि भाषा लोगों को उनके इतिहास, विरासत और संस्कृति से जोड़ती है और विदेशों में रहने वाली नई पीढ़ी को अपनी मातृभूमि से जोड़े रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
Conclusion:
मोता सिंह सराय की करीब चार दशक लंबी यात्रा इस बात का उदाहरण है कि प्रवास के बावजूद अपनी भाषा और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव कैसे कायम रखा जा सकता है। इंग्लैंड में रहते हुए उन्होंने पंजाबी लेखकों, पाठकों और प्रवासी समुदाय के लिए साहित्यिक मंच तैयार करने में योगदान दिया। 17 करोड़ रुपये से अधिक की पंजाबी पुस्तकों के प्रकाशन और वितरण में उनकी भूमिका ने साहित्य को पंजाब से बाहर व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचाने में मदद की है। उनका प्रयास आने वाली पीढ़ियों को पंजाबी भाषा, इतिहास और संस्कृति से जोड़े रखने की दिशा में जारी है।
