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केस दर्ज करना आत्महत्या के लिए उकसाने का आधार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
वैवाहिक विवाद में पत्नी और उसके रिश्तेदारों को नहीं ठहराया जा सकता जिम्मेदार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि केवल केस दर्ज करने से पत्नी को पति की आत्महत्या के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि वैवाहिक विवाद के दौरान पत्नी या उसके रिश्तेदारों द्वारा केस दर्ज कराना मात्र इस आधार पर उन्हें पति की आत्महत्या के लिए उकसाने (abetment) का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करना एक वैध अधिकार है और इसे आत्महत्या के लिए उकसाने के रूप में नहीं देखा जा सकता, जब तक कि इसके पीछे स्पष्ट रूप से प्रत्यक्ष उकसावे या दबाव के प्रमाण न हों।
यह टिप्पणी एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें पति की आत्महत्या के लिए पत्नी और उसके परिवार को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की गई थी। अदालत ने कहा कि केवल वैवाहिक विवाद या कानूनी मुकदमेबाजी को आत्महत्या के लिए उकसाने का कारण मानना उचित नहीं है।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि किसी भी व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी ठहराने के लिए ठोस और प्रत्यक्ष साक्ष्य होना आवश्यक है, केवल आरोपों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
