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ईस्टर्न बाइपास से जोड़ने वाली सड़कों के निर्माण न होने पर किसानों का धरना तीसरे दिन भी जारी
लिखित आश्वासन के बावजूद सर्विस लेन नहीं बनने से भड़के किसान, निर्माण कार्य रोका
मेरठ रोड और रसूलपुर गांव को ईस्टर्न बाइपास से जोड़ने वाली सड़कों का निर्माण न होने से नाराज बीकेयू से जुड़े किसानों ने तीसरे दिन भी धरना जारी रखा। किसानों ने निर्माण कार्य ठप कर दिया और एनएचएआई व प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की।
ईस्टर्न बाइपास के दोनों ओर मेरठ रोड और रसूलपुर गांव को जोड़ने वाली सड़कों के निर्माण न होने से नाराज भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के बैनर तले किसानों ने रविवार को तीसरे दिन भी अपना विरोध प्रदर्शन जारी रखा। किसानों ने धरना देते हुए निर्माण कार्य पूरी तरह से रोक दिया।
ईस्टर्न बाइपास शहर के आउटर रिंग रोड का हिस्सा है, जो पूर्व मुख्यमंत्री एवं वर्तमान केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर की महत्वाकांक्षी परियोजना है। यह परियोजना भारतमाला परियोजना के तहत बनाई जा रही है, जिसका उद्देश्य शहर और एनएच-44 पर यातायात दबाव कम करना, आवागमन को सुगम बनाना, यात्रा समय घटाना और आसपास के गांवों के विकास को गति देना है।
किसानों का आरोप है कि मई 2025 में जिला प्रशासन की मौजूदगी में एनएचएआई अधिकारियों के साथ लिखित समझौता हुआ था, जिसमें ईस्टर्न बाइपास के एंट्री-एग्जिट प्वाइंट तक पहुंचने के लिए सर्विस लेन/कनेक्टिंग रोड बनाने का आश्वासन दिया गया था। बावजूद इसके अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
प्रदर्शन शुक्रवार को उस समय शुरू हुआ, जब किसानों और ग्रामीणों ने रिंग रोड का निर्माण कार्य पूरी तरह से रोकते हुए “स्थायी मोर्चा” लगा दिया। रविवार को भी बड़ी संख्या में किसान और ग्रामीण धरना स्थल पर जुटे और एनएचएआई तथा जिला प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की।
बीकेयू के राज्य अध्यक्ष रत्तन मान ने आरोप लगाया कि एनएचएआई अधिकारियों द्वारा लिखित समझौते का पालन न किए जाने के कारण किसानों को आंदोलन के लिए मजबूर होना पड़ा है।
उन्होंने कहा,
“मई 2025 में हमने आंदोलन किया था, जिसके बाद अधिकारियों ने लिखित रूप में सर्विस लेन देने का आश्वासन दिया था। लेकिन आज तक कनेक्टिंग रोड नहीं बनाई गई, इसलिए हमें फिर आंदोलन करना पड़ा।”
रत्तन मान ने सरकार और प्रशासन को चेतावनी दी कि जब तक समझौते के अनुसार सर्विस लेन का निर्माण नहीं किया जाता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
किसान नेता सतीश कंबोज ने कहा कि किसान और ग्रामीण किसी तरह का टकराव नहीं चाहते, लेकिन बार-बार लिखित समझौतों का उल्लंघन स्थिति को गंभीर बना सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि हालात बिगड़ते हैं तो इसकी जिम्मेदारी सरकार और प्रशासन की होगी।
उन्होंने मांग की कि मुख्यमंत्री और जिला प्रशासन तत्काल हस्तक्षेप कर इस समस्या का समाधान करें, ताकि आंदोलन समाप्त हो सके।
