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ईद-उल-फितर: रोज़ों के समापन का पर्व, भाईचारे और खुशियों का संदेश
‘मीठी ईद’ पर मिठाइयों का वितरण, दान और सामाजिक सद्भाव की परंपरा
ईद-उल-फितर इस्लाम का प्रमुख त्योहार है, जो रमजान के रोज़ों के समापन पर मनाया जाता है। यह पर्व भाईचारे, दान और खुशियों के आदान-प्रदान का प्रतीक है।
ईद-उल-फितर का त्योहार पहली बार मदीना में उस समय मनाया गया था, जब पैगंबर मुहम्मद मक्का से हिजरत करके वहां पहुंचे थे। आज यह त्योहार दुनिया भर में मुस्लिम समुदाय द्वारा बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है।
यह पर्व अब केवल धार्मिक सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आपसी भाईचारे और सामुदायिक सद्भाव का प्रतीक बन गया है।
‘मीठी ईद’ के नाम से प्रसिद्ध इस त्योहार पर लोग एक-दूसरे को मिठाइयां बांटते हैं। इसमें खास तौर पर शीर खुरमा (दूध से बनी सेवईं), खीर, खजूर और अन्य पारंपरिक मिठाइयां शामिल होती हैं।
ईद-उल-फितर का अर्थ है “रोज़ा खोलने का त्योहार”। इसका इतिहास सातवीं सदी से जुड़ा है, जब पैगंबर मुहम्मद ने ईद-उल-फितर और ईद-उल-अजहा को इस्लाम के दो प्रमुख त्योहार घोषित किया था, जो अल्लाह के प्रति कृतज्ञता, आस्था और भक्ति को व्यक्त करते हैं।
इस त्योहार के साथ दान की परंपरा भी गहराई से जुड़ी है। ज़कात (दान), ईदी (बच्चों को दिए जाने वाले पैसे या उपहार), ईद-उल-अजहा पर कुर्बानी का मांस बांटना, तथा जरूरतमंदों को कपड़े, भोजन और खिलौने देना आम प्रथाएं हैं, जो समाज के कमजोर वर्गों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाती हैं।
इस्लामी त्योहार हिजरी कैलेंडर के अनुसार मनाए जाते हैं, जो ग्रेगोरियन कैलेंडर से लगभग 10 दिन छोटा होता है। ईद-उल-फितर हिजरी वर्ष के दसवें महीने शव्वाल के पहले दिन मनाई जाती है।
शव्वाल के चांद का दिखना रमजान के रोज़ों के अंत और त्योहार की शुरुआत का संकेत होता है। ईद से एक रात पहले ‘चांद की रात’ मनाई जाती है, जिसमें लोग त्योहार की तैयारियां करते हैं और आपसी मेल-जोल बढ़ाते हैं।
यह त्योहार प्रेम, दया, उदारता और सामाजिक एकता का संदेश देता है।

