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डॉ. आंबेडकर की 135वीं जयंती पर संयुक्त राष्ट्र में संबोधन, संवैधानिक नैतिकता और वैश्विक सहयोग पर जोर
आईएएस अधिकारी डॉ. राजा शेखर वुंद्रू ने UN मुख्यालय में रखा व्याख्यान
डॉ. बी.आर. आंबेडकर की जयंती पर संयुक्त राष्ट्र में आयोजित कार्यक्रम में डॉ. राजा शेखर वुंद्रू ने संविधान, मानवाधिकार और वैश्विक सहयोग पर उनके विचारों की प्रासंगिकता बताई।
हरियाणा के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और प्रसिद्ध आंबेडकर विद्वान डॉ. राजा शेखर वुंद्रू ने संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में डॉ. भीमराव आंबेडकर की 135वीं जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्य भाषण दिया।
यह कार्यक्रम 14 अप्रैल को भारत के स्थायी मिशन द्वारा आयोजित किया गया था। कार्यक्रम का विषय था—‘डॉ. बी.आर. आंबेडकर की संवैधानिक नैतिकता की दृष्टि और बहुपक्षवाद (मल्टीलेटरलिज्म) में उसकी प्रासंगिकता।’
अपने संबोधन में डॉ. वुंद्रू ने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51 बहुपक्षीय सहयोग, वैश्विक मानकों के सम्मान और शांतिपूर्ण विवाद समाधान की भावना को दर्शाता है, जो संयुक्त राष्ट्र चार्टर (1945) के मूल तत्व हैं। भारत ने संयुक्त राष्ट्र के संस्थापक सदस्य के रूप में इस चार्टर पर हस्ताक्षर किए थे।
अनुच्छेद 51 के अनुसार, “राज्य का प्रयास होगा कि— (क) अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा दे; (ख) राष्ट्रों के बीच न्यायपूर्ण और सम्मानजनक संबंध बनाए रखे; (ग) अंतरराष्ट्रीय कानून और संधियों के प्रति सम्मान को बढ़ावा दे; और (घ) विवादों के समाधान के लिए मध्यस्थता को प्रोत्साहित करे।”
वुंद्रू ने कहा, “डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में बहुपक्षवाद को अनुच्छेद 51 के माध्यम से राज्य की मूल जिम्मेदारी के रूप में शामिल किया गया। इससे स्वतंत्र भारत को सहयोगी अंतरराष्ट्रीयता, वैश्विक कानून के सम्मान और शांतिपूर्ण संबंधों के प्रति प्रतिबद्ध किया गया—जो आज भी संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक मंचों पर भारत की भूमिका को प्रभावित करते हैं।”
उन्होंने बताया कि डॉ. आंबेडकर, जब भारतीय संविधान का निर्माण कर रहे थे, तब वे संयुक्त राष्ट्र के आदर्शों और मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (UDHR) के विकास से भली-भांति परिचित थे और उन्होंने संविधान के कई महत्वपूर्ण हिस्सों पर इसका प्रभाव डाला।
उन्होंने कहा, “यह एक ऐसा समय था जब भारत संयुक्त राष्ट्र का संस्थापक सदस्य बना (30 अक्टूबर 1945) और संविधान सभा की बहसें द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वैश्विक मानवाधिकारों की दिशा में चल रही प्रक्रिया के समानांतर चल रही थीं।”
वुंद्रू ने आगे बताया कि UDHR का मसौदा 1947-48 के बीच तैयार हुआ, ठीक उसी समय जब भारत का संविधान अंतिम रूप ले रहा था। भारत की प्रतिनिधि हंसा मेहता, जो संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की सदस्य भी थीं, ने समानता, भेदभाव-रहित व्यवस्था और महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान के मौलिक अधिकार सबसे प्रभावी और न्यायिक रूप से लागू होने वाले प्रावधान हैं, जिनमें समानता, भेदभाव का निषेध, अस्पृश्यता का उन्मूलन, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शोषण के खिलाफ अधिकार और अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक व शैक्षिक अधिकार शामिल हैं।
डॉ. वुंद्रू ने यह भी कहा कि डॉ. आंबेडकर ने संविधान सभा में इन अधिकारों की न्यायिकता (justiciability) का जोरदार समर्थन किया और कहा कि इन्हें राज्य के खिलाफ लागू किया जाना चाहिए, तभी ये सार्थक होंगे—जो संयुक्त राष्ट्र के उस दृष्टिकोण से मेल खाता है जिसमें अधिकार केवल आदर्श नहीं, बल्कि वास्तविक होने चाहिए।
संवैधानिक नैतिकता पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि 4 नवंबर 1948 को संविधान सभा में मसौदा पेश करते समय डॉ. आंबेडकर ने कहा था, “संवैधानिक नैतिकता कोई स्वाभाविक भावना नहीं है। इसे विकसित करना पड़ता है। हमें यह समझना होगा कि हमारे लोगों ने अभी इसे सीखना बाकी है। भारत में लोकतंत्र केवल एक ऊपरी परत है, जबकि समाज मूल रूप से अलोकतांत्रिक है।”
वुंद्रू ने कहा, “संवैधानिक नैतिकता और बहुपक्षवाद के बीच गहरा संबंध है। केवल संस्थाएं पर्याप्त नहीं होतीं, बल्कि नैतिक दृष्टिकोण का विकास भी आवश्यक है। इसी तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी, देशों द्वारा बहुपक्षीय सिद्धांतों को वास्तविक रूप से अपनाना ही वैश्विक व्यवस्था को मजबूत बनाता है।”
उन्होंने अंत में कहा कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर और भारतीय संविधान दोनों ही महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या उन्हें प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक सामाजिक और नैतिक ढांचा तैयार किया गया है—जैसा कि डॉ. आंबेडकर ने कहा था, यह एक स्वाभाविक भावना नहीं, बल्कि विकसित की जाने वाली प्रक्रिया है।

