राज्यसभा में पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा प्रभावी ढंग से उठाते हुए सांसद एवं पर्यावरणविद् संत बलबीर सिंह सीचेवाल ने मांग की कि पर्यावरण अध्ययन को अन्य मुख्य विषयों की तरह देश के सभी स्कूलों में अनिवार्य किया जाए। उन्होंने कहा कि जब प्राथमिक स्तर से ही बच्चों में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित की जाती है, तो वही बच्चे आगे चलकर समाज की सबसे बड़ी ताकत बनते हैं।
संत सीचेवाल ने कहा कि मानव और प्रकृति का संबंध सदियों पुराना है और सभी धर्मों में प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन जीने का संदेश दिया गया है। उन्होंने गुरबाणी का उल्लेख करते हुए कहा कि हवा, पानी और धरती मानव जीवन का आधार हैं, लेकिन आज मानव लालच के कारण प्रकृति के ये तीन अनमोल उपहार गंभीर संकट में हैं।
वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि इसके चलते विनाशकारी बाढ़, भीषण सूखे और समुद्री सुनामी का खतरा बढ़ गया है। जलवायु असंतुलन का सीधा असर मनुष्यों के साथ-साथ पशु, पक्षी, जलीय जीव और वनस्पति पर भी पड़ रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह स्थिति प्रकृति में मानव हस्तक्षेप का परिणाम है।
संत सीचेवाल ने कहा कि यदि आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य देना है, तो पर्यावरणीय चेतना को प्राथमिक शिक्षा का हिस्सा बनाना अनिवार्य है। बच्चों को बचपन से ही प्रकृति से प्रेम, सम्मान और संरक्षण की शिक्षा दी जाए, ताकि वे बड़े होकर जिम्मेदार नागरिक बन सकें।
उन्होंने यह भी कहा कि “थिंक ग्लोबली, एक्ट लोकली” का सिद्धांत तभी सफल हो सकता है, जब पर्यावरण शिक्षा केवल किताबों तक सीमित न रहकर जमीनी स्तर पर लागू की जाए। इसके लिए स्कूल पाठ्यक्रम में वृक्षारोपण, पौधों की देखभाल, जल संरक्षण, कचरा प्रबंधन और प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जैसे व्यावहारिक पाठ शामिल किए जाने चाहिए।
सदन में उनके इस विचार को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक दूरदर्शी और आवश्यक पहल के रूप में देखा जा रहा है।
